Sunday, July 23, 2017
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टेक्सटाइल सेक्टर का GST को लेकर विरोध कहीं बड़े पैमाने पर बेरोजगारी न पैदा कर दे!


भारत का सबसे बड़ा कर सुधार और एकीकृत टैक्स व्यवस्था जीएसटी लागू हुए 2 सप्ताह से अधिक का वक़्त हो चूका है लेकिन टेक्सटाइल सेक्टर का नई कर व्यवस्था को लेकर विरोध जस का तस बना हुआ है। कपड़ा के क्षेत्र में अग्रणी शहर गुजरात के सूरत से लेकर पंजाब के जालंधर और लुधियाना तक…


भारत का सबसे बड़ा कर सुधार और एकीकृत टैक्स व्यवस्था जीएसटी लागू हुए 2 सप्ताह से अधिक का वक़्त हो चूका है लेकिन टेक्सटाइल सेक्टर का नई कर व्यवस्था को लेकर विरोध जस का तस बना हुआ है। कपड़ा के क्षेत्र में अग्रणी शहर गुजरात के सूरत से लेकर पंजाब के जालंधर और लुधियाना तक विरोध बढ़ता जा रहा है।

गुजरात के अहमदाबाद में आज कारोबारियों की बहुत बड़ी रैली हो रही है जिसमें कपड़ा कारोबार से जुड़े 100 से ज्यादा संगठनों के लोग शामिल हैं।

साथ ही झारखंड के रामगढ़ में भी व्यापारियों ने प्रदर्शन किया। कारोबारियों का कहना है कि सरकार ने पूर्व में कहा था कि जीएसटी के लागू होने के बाद व्यापार में सरलीकरण आएगा। लेकिन अब सरकार उल्टा काम कर रही है। व्यापारियों का कहना है कि सरकार के इस टैक्स सिस्टम से कफ़न का कपड़ा भी महंगा हो जाएगा।

विरोध कर रहे पूरे देश के कपड़ा कारोबारियों के अनुसार सरकार को व्यापारियों की चिंता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इसका जल्द से जल्द कोई हल निकालें।

साथ ही कपड़ा व्यवसाय से जुड़े लोगों ने कहा है कि अगर जल्द से जल्द कोई हल नहीं निकाला गया तो टेक्सटाइल इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ने की आशंका है।

क्या है माँग और विरोध, कैसे फर्क पड़ेगा SMEs पर!

कपड़ा व्यापारियों की शुरू से ही माँग थी कि टेक्सटाइल सेक्टर के लिए एक सामान कर व्यवस्था हो। लेकिन सरकार ने मांग अनसुनी कर कपड़े पर कई चरणों में टैक्स लगा दिया।

जीएसटी में सूती कपड़ों, धागों और फैब्रिक पर पांच फीसदी का कर लगाया गया है। व्यापारियों का कहना है की कपड़े पर 70 साल में पहली बार टैक्स लगा है। व्यापारियों के अनुसार टैक्स सिर्फ़ प्रथम चरण में होना चाहिए था, जैसा पहले था। पहले सिर्फ उत्पाद शुल्क लगता था।

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मैन मेड फाइबर अर्थात नायलान और सिंथेटिक धागों पर 18 % की जीएसटी तय कर दी गई है। कपड़ा उद्योग की माँग है कि इसे 12 % किया जाए।

एक हजार रुपये से अधिक कीमत के परिधानों पर 12 फीसदी का कर लगाया गया है।  इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और कपड़े महंगे हो जायेंगे।

कपड़ा उद्योग का 35 प्रतिशत काम सिंथेटिक और नायलॉन धागों से ही होता है। भारतीय कपड़ा महासंघ के अनुसार अगर सिंथेटिक और नायलॉन धागों पर 18 फ़ीसदी का टैक्स कम नहीं किया गया तो एसएमई इकाइयों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि अभी तक वे उत्पाद शुल्क से मुक्त थे। साथ ही छोटे बिज़नेस तबाह हो जायेंगे, इससे रोजगार पर भी बहुत विपरीत असर होगा।

साथ ही जहाँ एक तरफ खादी यार्न, गांधी टोपी, भारत का राष्ट्रीय ध्वज आदि जीएसटी से बाहर रखा गया है और इन पर कोई टैक्स नहीं लगेगा, वहीँ खादी से बने अन्य एपरेल्स और खादी उत्पादों पर 5 फ़ीसदी से लेकर 18 फ़ीसदी तक जीएसटी लगेगा। यह आज़ादी के बाद से पहली बार है जब खादी पर टैक्स लगा है। इसका व्यापारियों से लेकर बुनकरों तक ने विरोध किया है।

कुछ व्यापारियों का कहना है कि अब उन्हें ख़रीद का विवरण रखना होगा, जिससे उनकी दिक्कतें बढेंगी। जबकि बहुत से कामगर ग्रामीण इलाक़ों में कपड़े का काम करते हैं, उन तक हर जानकारी पहुंचना मुश्किल है। वहीँ अधिकारियों के पास जुर्माना लगाने की पॉवर होगी जिससे वे व्यापारियों को नाहक ही परेशान करेंगे।

टैक्स के अलावा एक और पेंच है जो व्यापारियों को परेशान कर रहा है। जीएसटी व्यवस्था में 50 हजार रुपये से अधिक माल के ट्रांसपोर्ट के लिए काग़ज का बिल नहीं चलेगा। इसके लिए ईवे-बिल की व्यवस्था की गई है। जिसकी तैयारी ख़ुद सरकार ने पूरी नहीं की है।

टेक्सटाइल सेक्टर कितना बड़ा

गौरतलब है कि टेक्सटाइल सेक्टर रोजगार देने के मामले में भारत में दूसरे नंबर की इंडस्ट्री है। एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में क़रीब 25 करोड़ लोग इस व्यापार से जुड़े हैं। जिसमें क़रीब साढ़े 4 करोड़ बुनकर हैं। वहीँ साढ़े 4 करोड़ लोग सीधे तौर पर कपड़ा क्षेत्र से जुड़कर नौकरी पाते हैं।

देश की जीडीपी में टेक्सटाइल सेक्टर का योगदान 2 फ़ीसदी है। इसीलिए अर्थव्यवस्था के लिए यह क्षेत्र और महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कपड़ा सेक्टर का योगदान लगभग 10 फीसदी है। भारत क़रीब 100 देशों को कपड़ा निर्यात करता है। देश के निर्यात में इसका योगदान क़रीब 10 प्रतिशत है। पूरे विश्व का क़रीब 12 प्रतिशत कपड़ा हिन्दुस्तान ही पैदा करता है।

ज्यादातर लघु उद्योग अर्थात एसएमई इकाइयाँ भी कपड़ा क्षेत्र में कार्यरत हैं। लेकिन हड़ताल की वजह से पूरे देश में लघु इकाइयों की हालत सबसे बदतर है।

 

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