Sunday, July 23, 2017
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जीएसटी: कारोबारियों के विरोध की क्या है वजह?


संसद के विशेष सत्र में वित्त मंत्री अरुण जेटली 30 जून और 1 जुलाई की ठीक मध्यरात्रि को अपने पूरे लाव-लश्कर और धूमधाम के साथ जीएसटी लागू होने की घोषणा करेंगे। पिछले दस सालों में अनेक केंद्र सरकारों की भारी मशक्कत के बाद जीएसटी 1 जुलाई से हकीकत बन जाएगा। जीएसटी के गुणगान में अरसे…


संसद के विशेष सत्र में वित्त मंत्री अरुण जेटली 30 जून और 1 जुलाई की ठीक मध्यरात्रि को अपने पूरे लाव-लश्कर और धूमधाम के साथ जीएसटी लागू होने की घोषणा करेंगे। पिछले दस सालों में अनेक केंद्र सरकारों की भारी मशक्कत के बाद जीएसटी 1 जुलाई से हकीकत बन जाएगा।

जीएसटी के गुणगान में अरसे से सरकारी और गैर सरकारी अनेक दावे किए जाते रहे हैं कि इससे आर्थिक विकास और जीडीपी में एक-दो साल में 2 फीसदी का इजाफा हो जाएगा। अप्रत्यक्ष कर संग्रह 2-3 लाख करोड़ रुपए बढ़ जाएगा। रोजगार बढ़ेंगे, गरीबी खत्म हो जाएगी। भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा और काले धन में जबरदस्त कमी आएगी आदि-आदि।

क्या है जीएसटी की मुश्किल?

जैसे-जैसे इस कर को लागू करने की तारीख नजदीक आ रही है, देश भर के व्यापारियों में इसे लेकर असंतोष भड़क रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारियों के प्रदर्शन, हड़ताल, बंद की खबरों में अचानक बाढ़ आ गई है।

देश के क्षेत्रीय अखबार ऐसी खबरों से अटे पड़े हैं। दिल्ली, इंदौर, जयपुर, रांची, लखनऊ, आगरा जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में व्यापारी जीएसटी के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं, बल्कि दूर-दराज के छोटे शहरों-कस्बों से भी विरोध के स्वर मुखर हो गये हैं। इन खबरों में आक्रोश से आवेशित व्यापारियों का दर्द, दहशत साफ झलकता है।

यह कौन सा कायदा है?

पिछले दिनों मध्य प्रदेश राज्य सरकार के वित्त मंत्री जयंत मुलैया को प्रदेश के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र इंदौर में व्यापारियों ने घेर लिया।

इन व्यापारियों ने जीएसटी को लेकर सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा कर दिया और जी भर कर खरी-खोटी सुनाई कि यह कौन-सा कायदा है कि 30 जून तक आप नियम जारी करेंगे और 1 जुलाई से जीएसटी लागू कर देंगे।

क्या है व्यापारियों की दलील?

जीएसटी तैयार करने में सरकारों ने सालों साल लगाए, और व्यापारियों को एक दिन का समय देने को सरकार तैयार नहीं है। कारोबारियों पर बरसों से बीजेपी का ठप्पा लगा है। लेकिन सरकार ही सबसे ज्यादा जुल्म कर रही है। बार-बार सरकार व्यापारियों को चोर और काला बाजारी करने वाला बताती है।

केंद्र सरकार ने 30 जून की आधी रात से देश भर में जीएटी लागू करने का निर्णय लिया है।

मंत्री और सरकार हर कोई हम पर डंडा चलाने को आमदा रहता है। जब आप विपक्ष में थे, तो आप लोग ही जीएसटी का विरोध करनेवालों में सबसे आगे थे। सरकार का यह कृत्य दिनदहाड़े डकैती से कम नहीं है। इससे देश के 90 फीसदी छोटे-छोटे कारोबारी बरबाद हो जाएंगे। जीएसटी की जानकारी देने का प्रयास केवल चुनिंदा शहरों तक सीमित है। सरकार की मंशा अब व्यापारियों को जेल भेजने की दिखाई देती है।

इसमें विवाद की गुजाइंश कम है कि जनसंघ के समय से अधिकांश व्यापारी इसके साथ खड़े थे और पार्टी व्यापारियों-वैश्यों की कहलाती थी। न केवल बीजेपी, बल्कि उनकी पैतृक संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक समेत उनके अनेक संगठनों का खर्चा मुख्यत: गौ पट्टी का व्यापारी वर्ग ही उठाता रहा है।

व्यापारियों पर सबसे ज्यादा मार

देश का सारा खुदरा व्यापार सेवा क्षेत्र में आता है। देश की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान तकरीबन 60 फीसदी है।निर्विवाद रूप से जीएसटी  की सबसे मार सेवा क्षेत्र पर ही पड़ी है। मशहूर व्यापारी नेता प्रवीण खंडेलवाल के मुताबिक देश में तकरीबन 10 करोड छोटे-मोटे व्यापारी और दुकानदार हैं।

इनमें करीब 60 फीसदी बेहद कम पढ़े-लिखे और कंप्यूटर से अनभिज्ञ हैं। माना जा सकता है कि 6 करोड़ से अधिक कारोबारियों का कंप्यूटर से अब तक कोई वास्ता नहीं रहा है। पर जीएसटी की पूरी बुनियाद कंप्यूटर पर खड़ी है।

जीएसटी अनुपालन जीएसटीएन नेटवर्क से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम के बिना हो ही नहीं सकता है। इसके अलावा छोटे-छोटे शहरों-कस्बों के लाख-करोड़ों व्यापारियों की आम शिकायत है कि उनके पास न तो जीएसटी की जरूरी जानकारी है, रिटर्न की और न ही इसके लिए कोई बुनियादी ढांचा है।

आधारहीन नहीं है शिकायत?

इन व्यापारियों की यह शिकायत आधारहीन नहीं है। जीएसटी के बारे में जागरूकता फैलने और शिक्षित करने में केंद्र सरकार की कोशिशें काफी सीमित और नाकाम रही हैं।

सरकारी प्रयास केवल बड़े-बड़े शहरों और कॉरपोरट जगत तक ही सीमित रहे हैं। फिर भी आज कॉरपोरेट जगत जीएसटी लागू करने की सरकारी की हड़बोग से खुश नहीं है। बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय वित्त सलाहकार कंपनियां भी जनवरी महीने में कह चुकी हैं कि जीएसटी के लिए अभी कॉरपोरेट जगत को और समय देना चाहिए। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं से सीधे जुड़े व्यापार श्रृंखला के आखिरी छोर के इन लाखों-करोड़ों छोटे व्यापारियों को जीएसटी के लिए तैयार करने के कोई मुकम्मल प्रयास किसी स्तर पर सरकार ने नहीं किये हैं।

सबको मालूम है कि इन तमाम व्यापारियों का अप्रत्यक्ष कर से नाम मात्र का भी वास्ता नहीं रहा है, न ही इनके पास एकाउंटेंट है, न ही सीए। इनका आज सारा काम कैश में होता है। जीएसटी के अनुपालन में व्यापारियों की यह कमजोरी सबसे बड़ी बाधा बन रही है, जिसके कारण वे सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।

सबसे ज्यादा आक्रांत हैं कपड़ा व्यापारी

सबसे ज्यादा आक्रोश देश के कपड़ा कारोबार में है। जीएसटी के खिलाफ सबसे पहले कपड़ा व्यापारी ही लामबंद और सड़क पर उतरे हैं। देश में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार कपड़ा कारोबार ही मुहैया कराता है।

कपड़ा व्यापारी मुगालते में थे कि हमेशा की तरह कपड़ा व्यापार भी जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जायेगा। इन व्यापारियों का कहना है कि हिंदुस्तान में अब तक कपड़ा व्यापार सभी प्रकारों से मुक्त रहा है।

पूर्व में कपड़ा निर्माण के समय ही उत्पाद शुल्क लगता था। मिलों से एक बार कपड़ा बाहर आने पर कभी कोई कर नहीं लगता था। व्यापारियों का कहना है कि टुकड़ों-टुकड़ों में कट कर बिकने वाले कपड़े पर जीएसटी लगाने से कारोबार का भविष्य ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।

वस्त्र निर्माण कई चरणों में होता है। कई प्रक्रिया और हाथों से गुजरने के बाद यह बाजार में बिकने पहुंचता है। सबको मालूम है कि सबसे ज्यादा कपड़ा ग्रामीण भारत में बिकता है। अब सारे व्यापारिक कामों में कंप्यूटर की जरूरत पड़ेगी।जीएसटी राज में ऑनलाइन बिल जनरेटर करना होगा, जब बिजली नहीं होगी, तो व्यापार कैसे करेंगे।

जीएसटी के हर महीने रिटर्न फाइल करने के लिए पेशेवर लोगों की जरूरत होगी, इससे व्यापार की लागत बढ़ेगी। इन व्यापारियों की धारणा है कि अंतिम समय में कपड़े पर जीएसटी लगाकर सरकार ने तुगलकी काम किया है।

इन व्यापारियों की मांग है कि सरकार को टैक्स लगाना है, तो एकल पाइंट पर लगाये। अलग-अलग स्तर पर टैक्स लगाने से काफी परेशानी आयेगी। जीएसटी में प्रावधान है कि बिना ‘वे बिल’ के कहीं भी माल नहीं भेजा जा सकता है। ई-वे बिल के लिए खुद सरकार की तैयारी पूरी नहीं है। जीएसटी व्यवस्था में 50 हजार रुपये से अधिक माल के ट्रांसपोर्ट के लिए कागजी बिल की बजाए ई-बिल की आवश्यकता होगी।

कपड़े पर प्रथम चरण मे ही टैक्स लगना चाहिए। 70 सालों से यह ही व्यवस्था है। ऐसी व्यवस्था जीएसटी में भी होनी चाहिए। व्यापारियों की धारणा है कि इससे इंस्पेक्टर राज खत्म नहीं होगा, बल्कि इससे इंस्पेक्टर राज और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। जैसा वित्त मंत्री दावा कर रहे हैं।

कपड़े हो जाएंगे महंगे

कपड़ा निर्माता और निर्यातक भी जीएसटी से खुश नहीं हैं। इनके अनेक संगठनों का कहना है कि सूती और सिंथेटिक फाइबर पर करों की भिन्नता के कारण व्याख्या संबंधित मुद्दे पैदा होंगे।

जीएसटी में सूती कपड़ों, धागों और फैब्रिक पर पांच फीसदी कर लगाया गया है, जबकि सिंथेटिक या मानव निर्मित फाइबर और सिंथेटिक धागे पर 18 फीसदी की दर से कर लगाया गया है।

एक हजार रुपये से अधिक कीमत के परिधानों पर 12 फीसदी पर का करारोपण है। इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और कपड़े महंगे हो जायेंगे। इन संगठनों को भी उम्मीद थी कि एक सरल कर व्यवस्था जीएसटी में होगी जिसमें पूरी मूल्य श्रृंखला में एक ही एकल दर होगी।

सजा का खौफ 

जीएसटी व्यवस्था में विभिन्न अपराधों के लिए 21 सजा और जुर्मानों का प्रावधान है। समय पर रिटर्न नहीं भरने पर प्रतिदिन 100 रुपये जुर्माना लगेगा। बुरी नीयत से की गई धोखाधड़ी के लिए टैक्स के बराबर 100 फीसदी जुर्माना अदा करना पड़ेगा। पर अज्ञानतावश कर चोरी पर टैक्स का दस फीसदी ही जुर्माना लगेगा। 25 लाख रुपये की कर चोरी पर एक साल जेल और जुर्माना हो सकता है।

50 लाख रुपए से अधिक कर चोरी पकड़ने जाने पर तीन साल की सजा हो सकती है। पर दो करोड़ रुपये की कर चोरी पर कानून बहुत सख्त है। इसमें गैर-जमानती गिरफ्तारी और पांच साल तक की सजा का प्रावधान है।

तकरीबन 12 किस्म के अपराधों के लिए जीएसटी व्यवस्था के तहत गिरफ्तारी का प्रावधान है। वस्तु या सेवा बेचने पर इनवांइस नहीं जारी करना, माल या सेवा बेचे बिना इनवॉइस जारी करना, जमा कर को अदा न करना, वास्तव में माल या सेवा प्राप्त किये हुए बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट लेना, इरादतन वित्तीय रिकॉर्ड में फर्जीवाडा और कपट पूर्वक टैक्स रिफंड लेना आदि इस प्रकार के अपराध शामिल हैं।

जीएसटी व्यवस्था के दंडात्मक प्रावधानों से व्यापारियों में काफी खौफ है और खुलकर इनका विरोध कर रहे हैं। दिग्गज कर विशेषज्ञों की राय है कि इन प्रावधनों को जीएसटी लागू होने के एक साल बाद लागू करना ज्यादा व्यावहारिक है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कंपनियों को सख्त चेतावनी दी है कि जो कंपनियां जीएसटी के लाभों को उपभोक्ता को नहीं देंगी, उनका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जायेगा और कानून के मुताबिक दंड के भोगी होंगे। अनेक कॉरपोरेट वकील जीएसटी के ‘प्रॉफिट क्लास’ उपबंध से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि इस कानून में खामियां हैं। इससे बेवजह विवाद बढ़ेंगे और टैक्स आतंकवाद फैलेगा।

क्या जीएसटी वाटरलू साबित होगा

बीजेपी के दिग्गज नेता-सांसद और वित्त मंत्री के कटु आलोचक सुब्रह्मण्यम स्वामी ने मोदी सरकार को चेताया है कि देश की आर्थिक हालात जीएसटी को झेलने के लायक नहीं है।

उन्होंने जीएसटी की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि ऐसे हालात में जीएसटी लागू किया जाता है, तो देश में वाटरलू जैसी स्थितियां उत्पन्न हो जाएंगी।

वाटरलू युद्ध में अजेय नेपोलियन को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री ने भी मांग की है कि वर्तमान हालात में जीएसटी लागू किया जाना ठीक नहीं है। उन्होंने वित्त मंत्री को जीएसटी लागू करने की तारीख टालने का भी सुझाव दिया है।

आनेवाला समय काफी चुनौती पूर्ण होगा, कर लगानेवालों के लिए भी और कर देने वालों के लिए भी। पहले किसानों और अब व्यापारियों का बढ़ता अंसतोष जीविका के लिए शुभ लक्षण नहीं है। जीएसटी को लेकर दुनिया भर का अनुभव बताता है कि इससे सरकार का कर संग्रह बढ़ता है, कॉरपोरेट को ही लाभ होता है और आय विषमता बढ़ती है।(By: Rajesh Raparia )

Source: FirstPost.com

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