Saturday, September 23, 2017
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विशेष: नई सरकार आने के बाद से SME के प्रति सरकारी नजरिये में बदलाव आया है


भारत की अर्थव्यवस्था में लघु और मध्यम उद्योगों का योगदान आज़ादी के पहले से रहा है। कभी गांधी ने इसी श्रेणी में शुमार खादी और ग्रामोद्योग का उत्थान कर ब्रिटिश साम्रज्य के ख़िलाफ़ भारत के गांवो को जागृत करने में सफ़लता पायी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था में लघु और मझौले…


भारत की अर्थव्यवस्था में लघु और मध्यम उद्योगों का योगदान आज़ादी के पहले से रहा है। कभी गांधी ने इसी श्रेणी में शुमार खादी और ग्रामोद्योग का उत्थान कर ब्रिटिश साम्रज्य के ख़िलाफ़ भारत के गांवो को जागृत करने में सफ़लता पायी थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था में लघु और मझौले उद्योगों का अहम् योगदान रहा है। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के तेज़ी से बढ़ते आयामों में से एक है।

हाल के वर्षों में एसएमई की औसत विकास दर क़रीब 10 फ़ीसदी रही है, जो कॉरपोरेट सेक्टर के विकास से भी अधिक है। देश के कुल निर्यात में लघु और मझौले उद्योगों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में कुल 11 करोड़ लोग कार्यरत हैं। इतना सब होने के बावज़ूद देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद में एसएमई की हिस्सेदारी महज़ 8 फ़ीसदी है। यह स्थिती इस क्षेत्र में निवेश और संसाधनो के आभाव की ओर इंगित करती है।

खादी से लेकर छोटे कल-पुर्जो तक और मुर्गी पालन-मछली पालन से लेकर कृषि आधारित व्यवसायों तक को अपने में समेटे इस उद्योग की सबसे प्रमुख समस्या इसका असंगठित होना है। ये उद्योग छोटे शहरों से लेकर गांवो और क़स्बों तक फ़ैले हुए हैं। सरकार के पास इनका पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण इस क्षेत्र के लिए सटीक और दूरगामी नीतियां बनाना हमेशा से मुश्किल कार्य रहा है।

इसके अलावा यह क्षेत्र निवेश की कमी से भी जूझता रहा है। ग़ौरतलब है कि इस सेक्टर में पूंजी का एक बड़ा हिस्सा क़र्ज़ के रूप में आता है। वापसी की कोई ठोस गारन्टी न होने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी छोटे और मझौले उद्योगों को क़र्ज़ देने में हीलाहवाली करते रहे हैं।

2014 में राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद एसएमई के प्रति सरकारी नजरिये में बदलाव आया है। नई सरकार इस क्षेत्र को भारत में उत्पादन हब बनाने और विनिर्माण में चीन को टक्कर देने का जरिया मान रही है।

मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा बैंक जैसी योजनाएं इसी का हिस्सा हैं। लेकिन 1991 में भारत में वैश्वीकरण आने के पश्चात यह क्षेत्र जिन नई चुनौतियों का सामना कर रहा हैं, उनसे निपटने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। यदि केंद्र सरकार इस देश को प्रोडक्शन हब बनाना चाहती है, तो उसे सुनिश्चित करना होगा कि छोटे एंव मझौले उद्योगों को बैंकों द्वारा सस्ते एंव सुलभ ऋण उपलब्ध कराया जाय। ताकि इस क्षेत्र में पूंजी की कमी को दूर किया जा सके। साथ ही सरकार इस क्षेत्र के लिए अपना सार्वजनिक ख़र्च भी बढ़ाना होगा।

इसके अलावा तमाम क़ानूनी अड़चने भी हैं, जो इस क्षेत्र में नए उद्यमियों को हतोत्साहित करती हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को मिल कर इन अड़चनों को शीघ्र दूर करने पर विचार करना चाहिए।

समय-समय पर लघु उद्योगों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित करना भी अत्यंत आवश्यक है, जिससे कि उनका मनोबल लगातार बढ़ता रहे। वर्तमान सरकार ने इस दिशा में काम भी किया है। हाल ही में नेशनल एमएसएमई पुरस्कार 2015 दिए गए हैं, जबकि पिछले साल इन्हीं पुरस्कारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की थी। जरुरत है ऐसे कार्यक्रम लगातार होते रहें।

वस्तुतः लघु एंव मध्यम उद्योगों को उन्नत करने की आवश्यकता केवल देश को प्रोडक्शन हब बनाने की दृष्टि से ही नहीं, अपितु इस नजरिये से भी महत्वपूर्ण है कि इतनी बड़ी युवा आबादी को रोज़गार देना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार इस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में तभी दक्ष हो सकती है, जब वह भारत में एसएमई के विकास पर ध्यान केंद्रित करे।

अंत में आप सभी को अंतर्राष्ट्रीय एमएसएमई दिवस की शुभकामनाएं! छोटे उद्योग-बड़ा प्रभाव

(By: शशांकमणि चतुर्वेदी, युवा पत्रकार)

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